Sunday, July 24, 2011

रुदाली का सच्चा दुख


 कितना सच्चा रोई होगी
आज एक रुदाली भी..
घर मे पति की लाश पड़ी हैं
बाहर रोने जाना हैं..........
बात आ पड़ी हैं पैसो की
आख़िर पति को भी तो..
दफ़नाना हैं..............
काश कोई समझ पाता
उसकी सच्ची पीड़ा को
बिना पैसो के पति का
विसर्जन कैसे वो कर पाएगी....
इस दुनिया की तिरस्कृत प्राणी
इतना बड़ा दुख कैसे से पाएगी?
पैसो की सच्ची कीमत 
इस वक़्त...............
उस से ज़्यादा समझे है कौन?
पर पीड़ा को अपनी पीड़ा
जिसने हरदम माना हैं
अपने दुख पीछे रह जाते
पर पीड़ा के आगे..
छिपा के अपनी खुद की पीड़ा
रोती चिल्ला चिल्ला कर
सबके आगे.......
नारी तेरी "यह भी" दशा हैं..
कितनी दुखद तेरी व्यथा है
पुरुष कहा समझ पाए हैं?
वो तो तेरी बेबसी को भी
अपना हथियार बनाए  है
चोट जितनी गहरी होती
पीड़ा उतनी ज़्यादा होती
कभी करो ये मन मे विचार
नारी को नारी ही समझो
करो उस पर यह उपकार
जनम दिया जिसने पुरुषो को
वही उसे सताता हैं....
कैसा हैं ये पुरुष समाज
तरस उस पे आता हैं
आज मुझे सब कह लेने दो
अपना दुख रो लेने दो..
फिर शायद कह पाउ न
अंतर की गहरी पीड़ा को
शायद मैं फिर उडेल पाउ न
मुझको समझो, मुझको जानो (नारी मन)
सब कुछ समझ जाओगे
पर पीड़ा को अपनी पीड़ा 
उस दिन से तुम पाओगे...................







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