Sunday, August 28, 2016


मैं तुम्हे फिर मिलूंगा
कहाँ, कैसे, कब 
पता नहीं
शायद 
तुम्हारी कल्पनाओं में
तुम्हारी ही प्रेरणा बन
तुम्हारी कलम में 
मैं उतरूंगा
या तुम्हारी 
खूबसूरत डायरी पर
एक खामोश तहरीर की तरह
मैं तुम्हे देखता रहूँगा
मैं तुम्हे फिर मिलूंगा
कहाँ, कैसे, कब पता नहीं

चाँद की रौशनी बन
दूंगा एक रात
तारों की चादर बिछा
बैठ जाऊंगा तुम्हारे  पास
रात भर बैठ कर
बतियाते हुए
बिताएंगे रात
मैं तुम्हे फिर मिलूंगा
कब ,कहाँ ,कैसे
पता नहीं


बारिश की बूँद बन
चमकूँगा तुम्हारी पेशानी पे
एक शीतल एहसास बन
मैं तुमसे फिर मिलूंगा
कब कहाँ कैसे पता नहीं

मुझे इतना पता है
वक़्त के फासले चाहे
कहीं तक ले जाये
पर मैं हर जनम में
तुम्हारे साथ चलूँगा
तुम्हारी परछाई बन
भले ही जिस्म जल कर
खाक हो जाये
या मौत  बेरहमी से
मुझे ले जाये
तुम्हे फिर भी मिलूंगा
कब कहाँ कैसे पता नहीं

तुम्हारी यादों में
रोशन रहूँगा
तुम्हारे तनहा लम्हों में
आंसू बन
तुम्हारी आँख से गिरूँगा
मैं तुम्हे फिर मिलूंगा
कब कहा कैसे पता नहीं

आज भैया को बिछुड़े एक महीना हुआ

Thursday, August 25, 2016

कैसे आगे बढ जाउ

देखों न सब कह रहे है
रुक क्यों गई हो?
एक जगह खड़ी क्यों हो?
आगे बढ़ो
दुनिया किसी के जाने से 
रुक् थोड़ी न जाती है?
कोई भी मंज़र परदे पे 
ज्यादा देर टिका रहे तो
परेशान कर देता है
ये सब दुनियादारी की बातें
मुझे भी पता है
लेकिन क्या करू
आँखों से तुम्हारा चेहरा
ओझल ही नहीं होता
बात बात पे तुम्हारी याद आती है
आँखे तुरंत भर आती है
कैसे भुलु तुम्हे?
तुम्ही बताओ?
कैसे बढूँ आगे?
तुम्हारे बिना
साथ चलने का वादा 
किया था न तुमने
कहा था तुम्हे कन्धा देकर
अंतिम विदा दूंगा
लेकिन ये क्या
तुम तो खुद ही
दुसरे का कन्धा ले
चल पड़े 
अनंत यात्रा की ओर
जहाँ सबका जाना तय है
लेकिन इतनी जल्दी नहीं
बीच रस्ते पे भी नहीं
मेरा रास्ता तुम्हारे साथ था
तुम्हारी तरह था
लेकिन अब
जब मंजिल ही न रही तो रास्ता कैसा
उम् भर सोचते रहे
चलो अब मिलेगी मंजिल
सब्र करते करते आ गए
उम् के इस मोड़ तक
अब न मोड़ रहा न मंज़िल
बोलो कैसे बढूँ आगे?
कैसे चलु अकेले?
तुम्हारे बिना
शायद अब संभव नहीं ये सब??????
एक अनुत्तरित प्रश्न

Wednesday, August 24, 2016

जब भी लौटती हूँ 
मंदिर से
आँखों में आंसू 
भर आते है
एक ही सवाल 
आता है मन में
भगवन मैंने तुम्हारा 
क्या बिगाड़ा था
जो तुमने 
ऐसा दुःख दिया
जब पिता चाहिए था
पिता छीन लिया
जब भाई चाहिए था
भाई विहीन किया
कौन सी दुश्मनी 
निभा रहे हो
जब भी सोचती हूँ
थोडा दृढ बनू
कुछ अपनी ताक़त से 
खड़ी हो जाऊ
तुम टाँगे ही 
तोड़ देते हो
क्यों बार बार 
मुझे हिला देते हो
नहीं बची अब 
मुझमे हिम्मत
नहीं दे सकती 
तुम्हे अपने 
प्यार की कीमत
प्ल्ज़ अब 
रस्ते में मत आओ
मत सताओ
बहुत दुखी, 
बहुत अकेली हूँ
अब और नहीं 
झेल पाऊँगी
जो तुमने दिया दुःख
यही बहुत बड़े है
क्या करू 
अब तुम ही सुझाओ
अब मुझे दुःख से छुड़ाओ
या ले लो 
मेरी भी जान
ताकि 
न रहे बांस
न बजे बांसुरी
अपनों का बिछड़ना हिला देता है 

Tuesday, August 23, 2016

कितने निष्ठुर हो तुम

देखो न प्ल्ज़ 
तुम मुझे कितना 
तंग करते हो
पहले तो तुम 
ऐसे नहीं थे
मेरी हर बात का  
मुझसे ज्यादा  
ख्याल रहता था तुम्हे
नहीं देख पाते थे 
तुम मुझे उदास
मुझे देख कर 
जिया करते थे
मेरी हर जिद, 
मेरी हर न मानने वाली बात भी 
मान लिया करते थे
मेरे बिना कहे ही 
मुझे समझ जाया करते थे
कभी कुछ 
कहना ही नहीं पड़ता था
मन करता था 
लडू तुमसे
लेकिन 
तुम्हारी सौम्यता, शालीनता
मुझे रोक देती थी
सच कितने सहनशील थे तुम
बरसो बरस इंतज़ार किया
कभी एक शब्द भी नहीं कहा
हमेशा मेरे साथ चले 
मेरा साया बन कर
अब तुम्हे कुछ 
सुनाई नहीं देता
न मेरा रोना, 
न चिल्लाना, 
न तुम्हारी याद में तड़पना, 
न आंसू बहाना
सच कितने 
निष्ठुर हो गए हो तुम
तुम तो कभी 
ऐसे नहीं थे

लौट आओ तुम

थक गई हूँ 
पुकार कर तुमको
तुम हो कि 
आवाज़ ही नहीं सुनते
अब तो रो रो कर छाती भी 
दर्द से कराहने लगी है
तुम हो कि तरस ही नहीं खाते
सर अब हर वक़्त भारी रहता है
सोच सोच कर तुमको
आँखे हमेशा नम
शायद कही  से सुन लो मेरी आवाज़
या देख लो मुझे रोते हुए
दौड़ कर लौट आओ तुम
मेरे लिए

Monday, August 22, 2016

मूर्तिकार हो तुम


तुम सोच रहे होंगे
मैं तुम्हे भूल रही हूँ
मैं तुम्हे भूल नहीं रही
बल्कि तुमसे अलग 
सांस लेने की कोशिश
कर रही हूँ
जानती हूँ ये कोशिश
नामुमकिन है
तुम तो घुले हो
मेरी साँसों में
मेरी बातों में
मेरे चलने, उठने, बैठने में
मुझे क्या आता था
सब तुमसे ही तो 
सीखा था
तुम्ही तो थे 
मेरे ट्रेनर
मेरे मूर्तिकार
मुझे घढ़ने वाले
सच जो भी 
मुझे देखता है
मन ही मन कहता है
हीरा हूँ मैं
लेकिन 
उन्हें क्या पता
मुझे जनम मेरे माता पिता ने 
बेशक दिया है
लेकिन खूबियां 
तुमने भरी है
अपने अधिकारों के लिए लड़ना,
अपनी बात को अच्छे ढंग से कहना
अपने पैरों पे खड़े होना
ड्राइव करना
सब को सब बात न बताना
सरलता, सौम्यता, स्पष्टवादिता
सब तुमने ही तो सिखाया
यहाँ तक कि कैसे दिखना है 
सबके सामने, 
कब क्या बोलना है
क्या पहन ना है
क्या खाना है
ये सब भी तुमसे सीखा
अब बताओ 
जिसे तुमने बनाया हो
जिसने तुम्हे 
हर अपनी बात में 
समाया हो
वो तुम्हे कैसे 
भूल सकता है
इतने एहसान है तुम्हारे
क्या कोई 
नज़रअंदाज कर सकता है
नहीं न
तो अब कभी मत सोचना
मैं तुम्हे भूल गई
बस ये सोचना
मैं खुद को भूल सकती हूँ
तुम्हे नहीं

कोई बात बने


तुम थामो 
मेरा हाथ
कुछ दूर तो 
साथ चले
तुम छेड़ो 
कोई साज
अपनी कोई 
बात चले
देखते थे जो 
सपने अकेले में
उन सपनो को 
पूरा करो
तब तो कोई 
बात बने
देखना तुम्हारा 
यूँ मुस्कुरा कर मुझे
मेरा पलके झुकाना
आए वही लम्हात 
तब तो कोई 
बात बने
तुम्हारी महक है 
मेरी साँसों में
तुम संग 
मचलता है दिल
तुम सुनाओ 
वही गीत
फिर तो 
कोई बात बने
तुम संग हुई 
मैं पूर्ण
तुमने किया 
मुझे सम्पूर्ण
एक हो गए 
हमारे खयालात
जागे फिर जज्बात
अब है कोई 
बात बनी