Monday, February 6, 2017

आ रही हूँ मैं

देखो खुश हो न
मेरा भी प्रोग्राम बन रहा है
तुम तक आने का
तुम नहीं आ सकते तो क्या
मैं ही आ जाती हूँ
मिलने से मतलब
तुम आओ या मैं
सब कुछ वैसा का वैसा 
ही चल रहा है 
जैसा तुम छोड़ के गए थे
मैं ही कुछ
 या यु कहो बहुत
 ज्यादा
लड़खड़ा गई हों तुम्हारे बगैर
तुम्हारे वादें, यादें सब बहुत रुलाती हैं
तुम होते तो आज
 कहानी ही कुछ और होती
लेकिन अब तो
 सब उल्टा पुल्टा है
तुम्हे मेरी आदत पता ही है
तुम्हारे सिवा किसी से भी
 खुलती ही कहाँ थी?
अब भी वही हाल है
हां आंख के आंसू
 रुकते ही नहीं
अब तो सीने में भी
 दर्द की शिकायत है
चलो कोई जल्दी नहीं
अब आकर ही विस्तार से बातें करेंगे
बाय बाय 
बाय बाय
See u soon

Wednesday, February 1, 2017

मौत को चुनौती

मौत
आओ मैं तुम्हारा 
वरण करना चाहती हूँ
हिम्मत है तो आँखे मिलाओ
सामने आओ
लेकिन मैं जानती हूँ
तुम नहीं आओगी
डराती हो दुनिया भर को
किंतु
मुझे नहीं डरा पाओगी

लोग रोते है
चीखते है
चिल्लाते है
यहाँ तक कि
तुमसे बचकर 
छिप जाना चाहते है
तब तुम लेती हो 
उनसे और मजे
कभी बीमारी भेज कर
कभी उनसे उनके 
अपनों को छीनकर
या खाली करके 
उनकी दौलत
तुम उन्हें बुरी तरह 
तोड़ देती हो
दिलवा कर उन्हें उन्ही के 
बच्चो से धोखा
उन्हें असहाय कर देती हो
बेचारे टूट कर वो दुनिया से
जब पकड़ लेते है खाट
तुम उन्हें शान से 
चार कंधो पे लाद
अपने घर ले चलती हो

है हिम्मत तो 
कभी किसी समर्थ को
हाथ लगा कर दिखाओ
टूट जायेंगे तुम्हारे बाजू
जरा एक बार 
हाथ तो मिलाओ

Monday, January 23, 2017

कहाँ हो तुम?

दोस्त कहाँ हो
मोबाइल की स्क्रीन पर
हर समय तुम्हारा
चमकता चेहरा
याद दिलाता है
तुम बस आ ही रहे होंगे
सच तुम बिन हर लम्हा
खाली ख़ाली लगता है
कुछ भी नहीं बदला
बस मेरा ही वक़्त बदल गया है
तुम बिन मैं
या मेरे बिन सोचो
एक डरावना ख्वाब सा लगता था
लेकिन पल पल
मैं इस डरावने ख्वाब के साथ
जी रही हूँ
या यूं कहो मर रही हूँ
कहते है
मोहब्बत दो लोगो के बीच में होती है
जब एक मरता है तो
दूसरा अपने आप ही मर जाता है
मेरा भी हाल ऐसा ही है
तुम ही कहो
कैसे जियूँ?????

तुमसे ही तो जिन्दा थी

तुम अचानक 
आ जाओ
और 
मुझे देख लो
शायद 
पहचान भी नहीं पाओगे
तुम सोच रहे होंगे 
क्यों????
सच कहूं 
तुम्हारे जाने से मेरा
भूत, भविष्य, वर्तमान
सब उलट पुलट हो गया
मेरी सारी खुशियां 
तुम्हारे साथ चली गई
मेरे जीने का जज्बा 
लुप्त सा हो गया
यहाँ तक की 
मेरा आत्म विश्वास
जिसपे तुम्हे 
सबसे ज्यादा 
नाज था
वो भी तुम ले गए
या यूँ कहो
खो सा गया है
अब बस बचा है तो 
मेरे पास
बस मेरा खोल!!!
आत्मा शरीर छोड़कर
तुम्हारे साथ जा चुकी है
बची है तो 
चंद साँसे
जो अपनी ही मौत का 
इन्तजार कर रही है
कुछ आंसू 
जो रोज इन आँखों से 
निकलकर
चेहरे में जज्ब हो जाते है
बची हैं 
तुम्हारी अनमोल यादें
जो मुझे जीने नहीं देती
मर तो मैं
तुम्हारे साथ ही गई थी!!!!

Thursday, December 8, 2016

मेरी मौत के बाद तुम
 सब रोना मत
वो ही करना जो मुझे पसंद है
मेरी लाश को नीचे उतार कर
उसके सिरहाने एक लालटेन जला देना
सब चारोओर बिठा कर जगजीत सिंह की गज़ले लगा देना
सच उनकी गज़ले मुझे बहुत सुकून देती है
जब तैयार करने का वक़्त आये तो
मुझे मत नहलाना
क्योंकि जिंदगी में मैंने कभी कोई गन्दा काम नहीं किया
जिसके लिए मुझे नहाना पड़े
या तुम सब को मुझे नहलाना पड़े
मेरा जीवन गंगा की तरह पावन है
मेरे भीतर न जाने कितने भाव भरे है
सचाई है, गहराई है सब पानी में धुलकर बह जायेगी
सो यु ही तैयार करना मुझे
मुझे शांति बहुत पसंद है
जीते जी भी
मरने के बाद भी
मुझे सफेद कपडे पहनाना
क्योंकि उस से बेहतर कोई रंग नहीं
जब मुझे ले जाने का वक़्त आये तो
तुम सब रोना नहीं
क्यूंकि मेरा कोमल दिल तुम्हारा रोना
सह नहीं पायेगा
जब जीते जी किसी को नहीं रुलाया
तो अंतिम वक़्त ऐसी गुस्ताखी क्यों?
मुझे जला देना और मेरी राख पूरे खेतो में बिखर देना
ताकि जब उस राख से पैदा
 हुआ
जो कोई भी अनाज खाये 
वो मेरी तरह संतुष्ठ होकर
बिना शिकायत दुनिया से जाये

statue


कब से बैठी हूँ 
यूँ ही मूर्तिवत
तुम स्टेचू कह कर 
पता नहीं 
कहाँ चले गए
अब आकर 
ओवर कहो तो उठू

लेकिन तुम तो 
शायद भूल गए
किसी को 
यूं बैठाकर भी 
आये हो

अब मेरी नजरों में भी 
पुराने नज़ारे है
वो पल जो हमने 
साथ साथ गुजारे है
जो एक एक कर 
आते है
तुम्हारी याद दिलाते है
फिर लौट जाते है

क्या करूँ 
मजबूर हूँ
पलक  भी 
झपका नहीं सकती
न पोछ सकती हूँ 
अपने हाथों से 
अपने ही गालों पे 
ढुलके हुए आंसू

रंग बिरंगे 
पुराने ख़्वाबों ने 
पलकों में
जमा ली है 
अपनी जगह
जो हटने का 
नाम ही नहीं लेते

सब कुछ तेजी से
चल रहा है
लेकिन 
मैं थमी बैठी हूँ
तुम्हारे इंतज़ार में

मैं भी थक गई हूँ 
एक पोजीशन में 
बैठे बैठे
अब जल्दी से आओ 
और 
खेल को ख़त्म करो

मुझे नहीं खेलना 
तुम्हारे साथ
तुम बहुत 
बेईमानी करते हो
चीटर कहीं के......

Sunday, December 4, 2016

स्तब्ध हूँ
समय की रेख से!

अपनी किस्मत की 
उड़ान से!

कहाँ जाऊंगी?
क्या करुँगी?
कुछ नहीं पता

जो निर्धारित लकीरे थी
वो तो मिट गई

रह गया शून्य
अंधकार, अकेला
लंबा, नुकीला रास्ता

अब इसे कैसे 
पार करना है
कुछ नहीं पता?

बस चलना है
तयशुदा रास्तो से 
अलग
एक नए रास्ते पर
अकेले, 
गति संभाल कर

क्योंकि 
उम्र भी हो चली
कोई सँभालने को भी नहीं
नया रास्ता
संभाली हुई गति
मेरा पैर बचा कर चलना
ईश्वर का आसरा