Saturday, December 3, 2011

बांह पसारे खड़ा था आकाश...
रह रह उथल रहा था सागर...
नि:शब्‍द बोलती ज़मीन पर
हम चल रहे थे साथ-साथ.......
तुमने पूछा मुझसे कि आखिर क्‍या चाहता हूं मैं.....
मैं क्‍या कहता.....मैं क्‍यों कहता.....
जब बांह पसारे खड़ा था आकाश....
रह रह उथल रहा था सागर....
निशब्‍द बोलती ज़मीन पर हम चल रहे थे....साथ-साथ...

क्या तुम्हारे ना बोलने से
सब ठीक हो जाना था
लहरो का चलना थम जाना था
नही मेरे दोस्त सफ़र को
अभी आगे तक ले जाना था
एक साथ चलने से कुछ नही होता हैं
मन को भी मिलाना पड़ता हैं
अनकहे को भी अपनाना पड़ता हैं
गर साथ चल कर एक बार फिर से
होता आसान अजनबी होना
तो हम क्या सारी दुनिया हमारे जैसी होती..
क्यूँ होते गम, दूरी और बेबसी..
इतनी आसान नही हैं जिंदगी
जितना तुम समझते हो...
बाहें पसारे आकाश के चक्कर मे
अपनी जिंदगी से क्यूँ लड़ते हो..

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