Friday, March 25, 2016

होली नहीं मनाता फकीर


जो रहता हो 
एक रंग में
जो जीता हो 
एक रंग मे
जिसने दुनिया के 
किसी रंग को
अपना नहीं माना
सुख हो या दुःख
सब उस ईश्वर का जाना

नहीं किया 
कभी किसी से गिला
जहर भी मिला तो
हंस कर 
मीरा की तरह पिया

पाये अनेक ताने
नानक की तरह 
फिर भी
रहे दुनिया से बेगाने

बुद्ध की तरह 
खुद को 
खो दिया
खुद भी रमे
सब को भी 
डुबो दिया

कबीर की तरह 
न देखि जात 
न पात
सबको दिया 
ढाई आखर का पाठ

झांकते रहे 
खुद के भीतर
राबिया की तरह
रौशनी देखि 
देखा उसका नूर

अपने दादा की तरह
जग में 
प्यार फैलाया
मरने से पहले
मरने का 
आनंद पाया

लगाया सबको गले
है ही आत्मा
आत्मा से 
न कुछ परे

फकीर का 
हर रंग एक है
है इसके भीतर 
अनेक रंग
फिर भी वो बेरंग है

नहीं चढ़ाता 
किसी रंग 
खुद पर
अपने रंग में 
सबको रंगता है
फिर भी यही कहेंगे
फकीर कभी 
होली नहीं मनाता
एक रंग में रहता है

4 Comments:

At March 25, 2016 at 4:34 AM , Blogger Upasna Siag said...

bahut bahut sundar....

 
At March 25, 2016 at 5:36 AM , Blogger Vaanbhatt said...

चढ़े न दूजो रंग...सुंदर रचना...

 
At March 25, 2016 at 8:33 AM , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (26-03-2016) को "होली तो अब होली" (चर्चा अंक - 2293) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

 
At March 25, 2016 at 9:18 PM , Anonymous Anonymous said...

naman.......

 

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