Monday, June 13, 2016

ओह तू स्त्री है क्या

स्त्री की कलम से निकला 
हर शब्द 
सच्चा नहीं होता
उसमे होती है मिलावट
वो नहीं लिख सकती 
खरा सच
जो उसपे गुजरी
या फिर 
जो उसने भोगा 
स्त्री होकर
वो अपनी आँखों का देखा भी
सच्ची सच्ची नहीं 
कर सकती बयान
क्यों की 
सच्चा लिखा 
पचा पाना भी
पुरुष समाज के लिए 
मुश्किल 
अनगिनत आँखे 
जो उसे देखती है पीछे से
नापती है 
उसके बदन का लोच
स्त्री अपनी 
पीठ पे लगी 
आँखों से देख लेती है
अपने बदन की
गोलाई का व्याकरण 
उसे रिश्तेदार सीखा देते है
छूते है इतनी सफाई से 
उसका तन
कि 
वो देखकर भी 
प्रतिरोध नहीं कर पाती 
बता दे अगर 
भोगा हुआ
सब पति को तो
बदचलन बन 
पति का
कोप भाजन हो जाती है
वाह री स्त्री
तू तो बिना गलती के भी
सजा पाती है

2 Comments:

At June 14, 2016 at 4:09 AM , Blogger Upasna Siag said...

वाह, बहुत सुन्दर और सटीक रचना

 
At June 14, 2016 at 8:40 AM , Anonymous Anonymous said...

:(

 

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