Thursday, April 14, 2016

आहत हूँ मैं


तुम्हारा यु मेरी 
इस तरह 
राह देखना
सच मुझे 
भीतर तक 
भिगो देता है
क्यों देखते हो 
मेरी राह
अब तो मैं 
तुम्हारे साथ भी नहीं
पास भी नहीं
तुमसे बहुत बहुत दूर
निकल आई हूँ 
जहाँ से लौटना 
संभव ही नहीं
ये रेशमी परदे
ये खिड़किया
मुझे पता है
सब आज भी 
वैसी की वैसी है
सड़क के 
उस पार का नजारा
रोज बदलता होगा
बदलती होंगी 
परछाइयाँ
सब मेरी तो नहीं
अब नहीं रहा 
वो वक़्त
वो बातें
मेरी तुम्हारी 
रोज की मुलाकाते
सच अब तुम मुझे
नहीं याद आते

3 Comments:

At April 15, 2016 at 4:49 AM , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-04-2016) को अति राजनीति वर्जयेत् (चर्चा अंक-2314) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

 
At April 15, 2016 at 9:53 PM , Blogger Onkar said...

बहुत सुन्दर

 
At April 19, 2016 at 7:02 AM , Anonymous Anonymous said...

:(

 

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