Thursday, June 30, 2016

आड़ी तिरछी लकीरे

वह छोटी सी थी
तभी खेल खेल में
कोयले से
खींचा करती थी
जमीन पर 
आड़ी तिरछी लकीरे
शायद कभी नसीब 
चमक जाये
लेकिन काली लकीरे भी
क्या कभी सफेद हुई है
या आई है उनसे चमक
कभी जिंदगी में
खेल खेल में जिंदगी ही
खेल हो गई
हमेशा की तरह
एक मासूम लड़की
फिर छली गई
काला टीका
काली लकीरे
काला नसीब
यही है भोलेपन की सजा
जो भोगनी है उसे
हर जनम में
बार बार
हर बार

1 Comments:

At July 1, 2016 at 10:54 PM , Anonymous Anonymous said...

:(

 

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

Links to this post:

Create a Link

<< Home