Wednesday, June 10, 2015

एक याद

कहाँ गए वो दिन 
जब शर्मा कर दुपट्टे से 
मुह छिपा कर 
भाग जाया करते थे
जरा सी तारीफ
गालों को गुलाबी 
कर दिया करती थी
बात करते हुए 
नजरे न मिलाना
अंगूठे से जमीन को कुरेदना
सब आज भी बहुत 
याद आता है
चले भी आओ कि
आज भी दिल
तुम्हारे लिए ही 
धड़क धड़क जाता है
वो मासूम सी आँखे
भोला सा चेहरा 
शरबती बातें
सब तुम्हे ही बुलाता है
कैसे भूल जाऊ तुम्हारे साथ
बिताये दोपहरी के वो पल
जब कोयल की कूक से
सारा आलम महक जाता था.....

(एक याद जो दिल में छपी है तुम्हारी)


4 Comments:

At June 11, 2015 at 5:13 AM , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (12-06-2015) को "उलझे हुए शब्द-ज़रूरी तो नहीं" { चर्चा - 2004 } पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

 
At June 11, 2015 at 11:04 PM , Blogger मन के - मनके said...

सुंदर---बहुत कुछा कहा जा सकता है---परंतु अक्सर ना कह कर भी बहुत कुछ कहा जा सकता है.

 
At June 11, 2015 at 11:31 PM , Blogger Madan Mohan Saxena said...

हृदयस्पर्शी भावपूर्ण प्रस्तुति.बहुत शानदार ,बधाई. कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

 
At June 15, 2015 at 2:17 AM , Anonymous Anonymous said...

sundar abhivyakti .... :)

 

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