Friday, July 1, 2016

प्रेम सूख गया है


जब बैठे हो सामने 
टेबल पर
करने को 
कोई बात न सूझे
समझो प्रेम सूख गया

हो हज़ारो बातें दिल में
बाँटने को 
एक दूजे से
लेकिन मुख से 
एक शब्द न फूटे
समझो प्रेम सूख गया

रहे एक ही घर में
एक ही कमरा हो
साथ रहने का
लेकिन फिर भी 
मन अकड़ा रहे
दिल न पसीजे
समझो प्रेम रूठ गया

शीशे के सामने 
खड़े होकर भी
खुद को 
निहारने का मन न करे
कौन देखने वाला है
ये सोच कर
खुद को तैयार न करे
समझो लग गई है 
प्रेम में फफूंद
प्रेम सूख गया

दरवाजे पर कोई आहट हो
दिल न धड़के
किसी के आने का 
इंतज़ार न हो
समझो प्रेम के बीज पे
तेज़ाब पड़ गया
प्रेम सूख गया

दिखने लगे एक दूजे के ऐब
होने लगे शिकायते
समझो प्रेम का पेड़
मुरझा रहा है

2 Comments:

At July 2, 2016 at 6:43 AM , Anonymous Anonymous said...

nice one ... :) :(

 
At July 21, 2016 at 4:37 AM , Blogger Arun Pancholi said...

very nice .... please join my blog ... https://panchopoetry.blogspot.in/

 

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