Friday, May 11, 2012

जख़्मो को हवा मत देना
मेरी मानो तो उन्हे दवा देना
वरना बहुत बढ़ जाएँगे
तुम्हारे लफ़्ज भी तब काम नही आएँगे

मातम छोड़ो हँसो अब
मिलने की रात आई हैं...

इंसान की खुश्बू रहती हैं इंसान बदलते रहते हैं
दरबार लगा रहता हैं यहाँ, दरबारी बदलते रहते हैं.....

काग़ज़ की नाव
कहाँ तक जाती?
उसे तो फसना ही था
था विश्वास से बना सब कुछ
नही किया था उसने कोई अपराध
कभी कभी किस्मत भी नही देती साथ
तब होता हैं ऐसा
हर काग़ज़ की नाव के साथ!!!

संभाल के मेरे दोस्त कहीं खो ना जाना
ये बंदा कुछ खास है तुम्हारा दीवाना


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