Wednesday, August 29, 2012




आज तुमने फिर से
अपनी यादों को झींझोड़ा हैं
उभर आई हैं वो बातें ...
जिन्हे सीढ़ियो पे छोड़ा हैं...........
मुड़ा था पैर मेरा तब लेकिन
दर्द आज भी जैसे का तैसा...हैं
कोरा मन था हमारा तब...
आज उसपे किसी और का पहरा हैं
कब लिख दिया था तुमने ...............
अपना नाम.........पता ही ना चला...
बरामदा भी वैसा , सीढ़िया भी वैसी,
तुम भी वैसे के वैसे...
लेकिन मेरा कारवाँ कहीं दूर जा पहुचा हैं...
नही दे सकती तुम्हारा साथ अब..............
मन का घाव आज भी उतना ही गहरा हैं..
(कुछ बाते, कुछ यादें कुछ साथ बिताए पल..)

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