Tuesday, July 1, 2014

घर नही जाना हैं क्या?...

 कल छत पर अकेले बैठी
बादलो को निहार रही थी...
डूबता हुआ सूरज...
तुम्हे तो पता हैं..
मुझे कितना पसंद हैं...
सूरज की रक्तिम आभा
सूरज... मानो मेरे कुछ
कहने से पहले ही शरम से
लाल हो गया हो...
जैसे उसे पता हो...कि मैं अब
उसे बस छेड़ने ही वाली हूँ
स्कूल के दिनो मे भी
सुबह सुबह जब मेरा 
आमना सामना
सूरज से हुआ करता था
तब मैं उसे रवि कह कर
परेशान किया करती थी..
आते जाते हाय रवि...बाय रवि...
दोस्ती का सा रिश्ता हो गया था हमारा..
बस मुझे उसकी जलन और तपन..
परेशान करती थी ...मैं दिमाग़ से कूल..
वो बेहद हॉट..ज़रा ज़रा सी बात पे.....
गुस्सा करने वाला...लेकिन फिर भी
हमारी बॉनडिंग अच्छी थी...
कहते हैं ना...पॉज़िटिव और नेगेटिव.....
स्वाभाव वाले जल्दी जुड़ जाते हैं.....
ऐसा था हमारा...प्यार....
अरे मैं क्या ले बैठी....
देखो अभी भी शाम के पाँच बजे हैं
मेरे कान मे फुसफुसा के कह रहा हैं रवि...
क्यूँ आज तुम्हे देर नही हो रही.....
घर नही जाना हैं क्या?...
मैने कहा जाना क्यूँ नही हैं...जल्दी से
अपनी टेबल समेटी ...
बस अब घर जाने के मूड मे हूँ..
बच्चे जो इंतज़ार कर रहे होंगे...
चलो बाय...कल मिलती हूँ....
अभी निकलना होगा....

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