Tuesday, April 22, 2014

चाँद की मजबूरी..



चाँद की मजबूरी..
घटते बढ़ते रहना..
बना देता हैं सबसे दूरी
क्या करे बेचारा
किस्मत का मारा हैं...
लेकिन आज भी ..
सबका राज दुलारा हैं..
करते हैं लोग इंतेज़ार..
चाँद के आने का.....
खाते हैं कसमे चाँद के सामने..
हमेशा साथ निभाने की...
चाँद हैं तब भी..
अपनी मजबूरी पे
मुस्कुरा के रह जाता हैं..
जनता हैं कल का दिन
कैसा होगा..उसके लिए
बस शर्मिंदा हो रह जाता हैं..
चाँद तुम मत होना शर्मिंदा..
हर दिन बदलना हैं तुम्हारी
खूबसूरत अदा...
मुझे बहुत भाती हैं....
तेरी उपस्थिति ही....चहु ओर
खुशिया ले आती हैं..

5 Comments:

At April 24, 2014 at 4:11 AM , Blogger Tamasha-E-Zindagi said...

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - रे मुसाफ़िर चलता ही जा पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

 
At April 24, 2014 at 6:40 AM , Blogger रश्मि शर्मा said...

Sundar

 
At April 24, 2014 at 7:32 AM , Blogger Anju (Anu) Chaudhary said...

वाह बहुत खूब ....

 
At April 24, 2014 at 3:21 PM , Blogger Unknown said...

चांद का हर रूप सुहाना है चाहे वह दूज का चांद हो या पूरणमासी का।

 
At May 19, 2014 at 9:07 AM , Anonymous Anonymous said...

sundar rachna ........!

 

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