Saturday, July 30, 2011

वो बोले दुश्मनी पे लिखो


वो बोले दुश्मनी पे लिखो
मैने कहा कैसे लिखूं..
नही हैं मेरी किसी से दुश्मनी..
वो बोले महसूस करो 
दुश्मनी के धागों को...
प्रेम के धागों को उलझाओ....
कुछ तीखे शब्दो के तीर चलाओ
रखो ना मन मे कोई समझौते की गुंज़ाइश
खड़ी हो जाएगी..दुश्मनी की इमारत......
ना झुकना कभी, अड़े रहना..
तान के सीना हरदम खड़े रहना....
इमारत बुलंद रहेगी....
प्रेम तो यहाँ......रह नही पाएगा.
नफ़रत की चिड़िया....हर समय
फुदगती रहेगी...

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