Friday, July 29, 2011






मित्र............ शब्दो का जंगल
फिर भी सूनी अभिव्यक्ति ??
भाव का मर्म ढेर....
संप्रेषण की कमी....
कहने को हैं बहुत कुछ..
किंतु भाषा हैं बौनी
कैसे होगा पूरा उदेश्य 
कैसे होगी विवेचना?
भावो को बाहर लाना होगा
शब्दो के जंगल को भी सजाना होगा
संप्रेषण को बढ़ाना होगा
भाषा का कद भी बढ़ाना होगा....
ना रह जाए कुछ पीछे
सारे भ्रमो को मिटाना होगा
तभी होगा नव सृजन...............









हाथ मे हाथ रहे..
हर दम तेरा साथ रहे....
विचारो मे प्रवाह रहे....
कुछ नया करने की चाह रहे....

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