Saturday, December 24, 2011


मुंह चिढाकर मुझको ,
वो भागे झट से मेरे कमरे से /
फिर झट से आकर अन्दर बोले
" इसे प्यार न समझ लेना "/
जब बाहर जाकर देखा तो
पाया उनको अपने ही आँगन में /
वो निगाहें नीची करके बोले
"इसे इज़हार न समझ लेना "

दोनो बातों मे ही प्यार समाया हैं
इनकार हो या इज़हार...............
हर जगह तुम्हे ही पाया हैं........
नही कह पाते हैं दिल की बात तो क्या
ये भी तो आपने ही सिखाया हैं...

आपके साथ ने, आपकी बात ने ख़ास बनाया/
यूँ तो शामें रोज़ आती हैं और चली जाती हैं /
पता चला मुझे जो साथ चला आपके मैं दो कदम/
कैसे रक्स करती है हवा , फिज़ा कैसे गुनगुनाती है .

हवाओं मे रकस तुमने ही जगाया हैं
शामो को गुनगुनाना तुमने ही सिखाया हैं
चले जब हाथ पकड़ के आपके साथ तो....
मौसम ने भी खुशी से मुस्कुराया हैं.....

मुझे मालूम नहीं होता है कैसा किसी के पीछे चलना /
मैंने खुद को कभी किसी कतार में खड़ा नहीं पाया

कतार मे तो आते हैं...जिन्हे कुछ चाहिए
तुम तो ऐसे शख्स हो...जो खुद से चला करते हैं
हर वक़्त अपने आप पे ही भरोसा किया करते हैं
कभी किसी के पीछे मत चलना...लोगो को आने देना
राहे नई बन जाएगी.....तुम्हे अलग पहचान दे जाएगी

तुम मेरी शामों में शामिल न सही अब /
तुम कोई बीता हुआ किस्सा नहीं हो ..
मेरी आँखों में झाँक कर देख लेते हैं लोग तुमको /
कौन कहता है तुम मेरा हिस्सा नहीं हो ..

तुम्हारा हिस्सा हूँ..तभी तुम्हारी आँखो मे ठहर पाया हूँ
वरना तो लोग आँसू समझ कर बहा देते थे मुझको
अच्छा हुआ आँखो मे झाँक लिया दिल मे उतर कर नही देखा
वरना हम खुद को कहाँ समेट पाते....थोड़ा बहुत दिख ही जाते

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