Thursday, February 16, 2012


तुम्हारा आना और झलक दिखला कर गुम हो जाना
मुझे विचलित सा कर जाता हैं
तुम्हारी एक झलक पाते ही मेरा गुम हो जाना
शायद मुझे तुम मे मिला जाता हैं
नही देख पाती तुम्हे लेकिन महसूस कर पाती हूँ
नही छू सकती हूँ तुम्हे
लेकिन बतिया पाती हूँ...
अपने सुख दुख सब तुम्हे
दिखला पाती हूँ....
और तुम ही दे पाते हो मुझे सहारा
अपना बना पाते हो
कोपल पत्ती को  एक संपूर्ण पत्ती मे बदल पाते हो..
सच बहुत रोमांचित करता हैं
जब तुम्हारी झलक ने मुझे नही रहने दिया मेरा अपना
तो तुम्हे पाकर क्या मुझे खोना होगा
तुम्हारे अस्तित्व मे खुद के अस्तित्व को विलीन करना होगा
तभी बनुगि मैं तुम.....तुम मैं....और तुम और मैं से बढ़कर हम

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