Monday, May 14, 2012

प्रियतम मिल गये अब क्या पाना हैं जिंदगी का यही अनमोल ख़ज़ाना हैं..

चाँद हमारी परछाई हैं
ये बात आज समझ मे आई हैं..

तुम्हारी कलम से उसकी खुश्बू आती हैं
ना जाने कैसे वो तुम्हे इतना महका जाती हैं???

आए आप धरती पे...हुई धरती गुलज़ार
क्या कहे आपके ज्ञान, प्रेम को
आप हो बुद्धि, ज्ञान का भंडार
नित नई बातों से अवगत करते
नये नये खजाने लाते......
करते हम पर उपकार
क्या करे समझ नही आ रहा
क्या दे आपको जनम दिन का उपहार...

मेरे मुस्कुराने से हँसी धरती
तुम्हारे रूठने से बिजली चॅमकी
अचानक हुई तेज़ बारिश
धुल गई मन की धरती....

जब भी सर को काटा, तुमने शमशीर से,
ये कलम और भी जिंदा हुई तीखी तीर सी

अनंत काल से अनत की यात्रा पे चले जा रहे हैं
जब तक ना मिले मंज़िल बढ़े जा रहे हैं
मत थकना मुसाफिर, दुनिया की भीड़ मे
रास्ते नित नये बने जा रहे हैं....

1 Comments:

At May 15, 2012 at 6:28 AM , Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

 

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