Sunday, September 2, 2012


मेरे आने का था अंदाज़ पुराना
लेकिन मेरे दोस्त तुमने फिर भी पहचाना
ये भी अदा तुम्हारी हैं..
तभी तो हर बात तुम्हारी मुझे
आज भी प्यारी हैं .....................


कुछ पल की बेवफाई ने ये हाल कर डाला हैं
मांग लिया हैं दुःख खुदा से, खुद पे ही जुर्म कर डाला हैं

विश्वास की संजीवनी ही जान बचाएगी ..
चाँद की रौशनी ही पार लगाएगी   
बाधा भी कट जाएगी ............
धीरे धीरे  सब कुछ संभल जायेगा
आँखों से दिल का हाल कह डालो..
ख़ामोशी को भी हथियार बना डालो 
सब समझ में आ  जायेगा
अनकहा भी सामने आ  जायेगा ...............
सुना जो मैंने कहा..


आंधियो ने सारा शहर उजाड़ डाला हैं..
बची थी जो दिल की बस्ती
उसे भी उखाड  डाला हैं
क्या करूँ आ  कर तेरे मैखाने में..
अब तो कुछ भी नहीं मेरे पास
शहर का शहर हुआ वीराना हैं 


वीरान हो गई जिसके दिल की बस्ती..
उस से मौसम की बात करते हो..
क्या दोस्त तुम भी ...
बेवक्त मज़ाक करते हो..


न किसी को पंनाह दी..
न किसी को बसने दिया
तेरे जाने के बाद अपना मकान
उम्र भर ख़ाली रहने दिया..


सांसो की लड़ी लड़ी में पिरोया था जिसको
वो कैसे जा सकता हैं, मेरी वीरान आँखों को
कैसे बंजर बना सकता हैं..
आयेगा जरूर यहीं कहीं छिपा बैठा हैं..
लुका छिपी के खेल में वो मुझे ........
कभी नहीं हरा सकता हैं..












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