Wednesday, February 6, 2013




डरना कैसा मौत से...
मरना तो हैं एक दिन
बारिश हो या धूप हो...
पता नही जिंदगी 
कितने दिन?

जमाने के साथ चल कर क्या करोगे...
वो तुम्हे हर बार पीछे छोड़ देगा..
तुम कितने भी लंबे डॅग भरोगे....
ऐसा ही हैं दुनिया का दस्तूर..

तेरे दिल पे हुकूमत कैसे कर लू...
तूने तो ना जाने कितनो को अपना मंत्री बनाया हैं..

तेरे मिट्टी के आँगन मे छिपा तेरा प्यार हैं..
सेमेंटी सी लिंक.......... हृदय रहित पुरुष सा खड़ा मुस्कुराता हैं..

अच्छा हैं ....मेरे किस्से
तुझे खनखनाते हैं, गुदगुदाते हैं
ये किस्से तो हम सिर्फ़ 
तेरे लिए ही बनाते हैं...
तुझे ही सुनाते हैं....चाहे कसम ले लो...

बहुत जोरो से बादल गरज रहे हैं...
लगता हैं आज आसमान सर पे उठाने का इरादा हैं...




2 Comments:

At February 6, 2013 at 2:34 AM , Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर रचना!

 
At February 7, 2013 at 12:04 AM , Blogger aparna khare said...

shukriya uncle..

 

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