Tuesday, July 1, 2014

"कहाँ खो जाते हो"


रिमझिम रिमझिम
बरसता हुआ पानी..
भीगते हुए हम...
हाथो मे हाथ डाले...
बतियाते हुए...

दुनिया की बातों से
बहुत दूर
खुद मे खोए हुए....
सर सर ठंडी हवा चल रही थी
जो पानी को अपने साथ
उड़ा लेना चाह रही थी...
सरसरते पत्ते जाने क्या
संदेशा देना चाह रहे थे..
काली चमकदार सड़क..
जैसे इंतज़ार कर रही थी हमारा
अभी गुजरेगा कोई प्रेमी युगल...
मेरे विराट सीने को चीरता हुआ
हर तरफ या तो खामोशी थी
या फिर प्रकती की आवाज़
सच कभी कभी सन्नाटा भी
कितना सुख देता हैं..
सुन पाते हैं
दिल की धड़कनो की आवाज़
वो भी कितना करीब से
मेरा मन था की आज तुम बोलो
मैं बस...किसी मीठे संगीत की तरह
तुम्हे सुनती जाउ बिना किसी रोक के...
आज तुम्हारी बातों मे
खो जाने का दिल था..कि तुम
किसी बात मे उलझे.....
शायद खुद से झगड़ रहे थे....
या यू कहो...तुम कही और थे...
मैं बोले जा रही थी बेपरवाह
तुम्हे बुलवाने की खातिर..
तुम खोए...खुद मे..खुद से ही
ना जाने क्यूँ?
मैने कई बार पूछा भी
पर शायद कोई गहरी बात थी
और तुम मुझे बता कर
दुखी नही करना चाहते थे...
अस्पस्त रूप से मुझे भी समझ आ रहा था
तुम्हारा यू मुसलसल सोचे जाना..
शायद कल की फिकर थी तुम्हे
मेरे कल की..हम दोनो के कल की..
मेरा कहना था जी लो संग आज....
कल का क्या भरोसा..कल किसने देखा हैं..
तभी मैं तुमसे बार बार कह रही थी...
"कहाँ खो जाते हो"
तुम उनीन्दे से..जवाब देते
यहीं तो हूँ तुम्हारे साथ
पर शायद नही..मेरे साथ नही
भविष्य के साथ थे तुम..
ख़ौफ़ के साथ थे तुम....
आशंका के साथ थे तुम

1 Comments:

At July 2, 2014 at 6:02 AM , Anonymous Anonymous said...

nice .

 

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