Tuesday, October 16, 2012

चंद अल्फ़ाज़



डाल के अपनी आदत जाने कहाँ छुप जाते हो..
बंद करू जो आँखे अपनी..मंद मंद मुस्काते  हो..

लो जी कल तक तो बनते थे बहुत वीर
आज हो गये धराशायी...ये कैसे शूरवीर

वो अपना दिल यू लुटाता  हैं...
एक दुपपटे पे बिखर जाता हैं...

समाया जो मुझमे तो क्यूँ निकल जाता हैं...
सोच के ये बात मेरा दम निकल जाता हैं

तालीम और संस्कार तो अब भी वही हैं...
क्या करे अब बच्चो की सोच अलग हैं

सिंदूरी शाम मे..... जो तुम आ जाओ..
चेहरा भी हो जाए गुलाबी...मैं यू शर्मा जाउ
दोनो का रंग मिल कर हो जाए एक........
तुम मुझे  ना पहचान पाओ......

तेरे लब पे हैं मेरा नाम
क्यूँ देते हो इसे और कोई पहचान..

सुंदर सृजन हैं तुम्हारा
रोने से नही लौटता  प्रियजन तुम्हारा
याद करोगे तो आ जाएगा...

उसकी छाँव मे जो गया
वो उसका हो गया..
नही लौटा अपनी जात मे...
कहने लगा तेरा हुआ तेरा हुआ..

दूसरे का हिस्सा खाएँगे...
बरकत कहाँ से लाएँगे...
लेगा जब हिसाब वो.....
बगले झाँकते नज़र आएँगे

जो देखा जमाना तो मोहब्बत कहाँ कर पाएगा..
कौन देगा इज़ाज़त मोहब्बत की....किसको किसको समझाएगा..
नही समझेंगे ये जालिम....इन्हे अपना जमाना याद आएगा..

मत लेना नाम हमारा मशहूर हम हो जाएँगे..
लोग मिलने नही देंगे..दूर हम हो जाएँगे..

इतने सवाल इतने जवाब..
या खुदा पढ़ा होता वक़्त पे...
तो गोया आज हम कलक्टर होते..

जिंदगी नही होती हसीन..
हम हसीन इसे बनाते हैं
करते हैं प्यार सबसे......
सबका प्यार पाते हैं..


मत जाओ अभी छोड़ कर...
अभी तो हम मिले हैं..
अभी तो ना जाने तुमसे
करने कितने शिकवे गिले हैं..

जो बीत गई सो बात पुरानी..
चलो छोड़े अब कोई  नई निशानी..

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