Friday, August 8, 2014

छोटी सी गौरैया



सच कहूँ रोना चाहती हूँ मैं
खूब फूट फूट कर..किसी नन्ही सी बच्ची के जैसे
खुद को एक छोटी सी गौरैया सा महसूस कर रही हूँ मैं..
जैसे नन्ही चिड़िया उड़ते उड़ते कहीं दूर आ पहुची हो..
एक निर्जन स्थान पे..जहाँ कोई नही हैं..नितांत अकेलापन
ना आदम, ना आदमजात ..नन्ही चिड़िया अब डर सी गई हैं
अकेली करे तो क्या करे..जब उड़ रही थी तब तो बहुत अच्छा लग रहा था..
यू की बस उड़ती रहे..और पहुच जाए बादलो के भी पार
अब जब बादल को भी पीछे छोड़ दिया तो...
अपना घर, बार, अम्मा, बाबा सब याद आ रहे हैं...
जहाँ सब तरफ खाली ही खाली हैं..वहाँ भी चिड़िया को चाहिए कोई कोना
जहाँ वो छिप कर अपने आँसू गिरा सके..
सच रोते समय हमे कोई कोना क्यूँ याद आता हैं..
या कोई सूनी जगह..जहाँ कोई हमारे आँसू ना देख सके..
ना ही देख सके हमारे चेहरे पे बनता बिगड़ता..भूगोल
सच रोते समय हम कितने नॅचुरल होते हैं..
फिर भी अपना चेहरा छिपा कर रोते हैं..
अरे ये मैं कहाँ आ गई..मुझे तो रोना था..
कह देना था वो सब कुछ..
जो कुछ बरसो से दिल के अंदर था...
लेकिन फिर भी कहीं कोई सुन ना ले
मेरी शिकायते..और कहे..अभी तक बड़ी नही हुई क्या?
क्या करू नही होना चाहती बड़ी...
नही सीखना चाहती दुनिया की बड़ी बड़ी बातें..
जिनमे सिर्फ़ खोखलापन हैं...बस नाम का अपनापन हैं..
मुझे रोना हैं..जोरो से रोना हैं..
तुम चुप करने आओगे ना..बोलो..
क्यूंकी मेरे रोने का एक कारण तुम भी हो..!!!!!


1 Comments:

At August 9, 2014 at 8:11 PM , Blogger राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें।

 

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