Thursday, December 8, 2016

statue


कब से बैठी हूँ 
यूँ ही मूर्तिवत
तुम स्टेचू कह कर 
पता नहीं 
कहाँ चले गए
अब आकर 
ओवर कहो तो उठू

लेकिन तुम तो 
शायद भूल गए
किसी को 
यूं बैठाकर भी 
आये हो

अब मेरी नजरों में भी 
पुराने नज़ारे है
वो पल जो हमने 
साथ साथ गुजारे है
जो एक एक कर 
आते है
तुम्हारी याद दिलाते है
फिर लौट जाते है

क्या करूँ 
मजबूर हूँ
पलक  भी 
झपका नहीं सकती
न पोछ सकती हूँ 
अपने हाथों से 
अपने ही गालों पे 
ढुलके हुए आंसू

रंग बिरंगे 
पुराने ख़्वाबों ने 
पलकों में
जमा ली है 
अपनी जगह
जो हटने का 
नाम ही नहीं लेते

सब कुछ तेजी से
चल रहा है
लेकिन 
मैं थमी बैठी हूँ
तुम्हारे इंतज़ार में

मैं भी थक गई हूँ 
एक पोजीशन में 
बैठे बैठे
अब जल्दी से आओ 
और 
खेल को ख़त्म करो

मुझे नहीं खेलना 
तुम्हारे साथ
तुम बहुत 
बेईमानी करते हो
चीटर कहीं के......

2 Comments:

At December 8, 2016 at 6:25 PM , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (10-12-2016) को "काँप रहा मन और तन" (चर्चा अंक-2551) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

 
At December 8, 2016 at 9:59 PM , Anonymous Anonymous said...

over...........:)

 

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