Wednesday, October 26, 2016

पीला रंग , दो ख्याल एक साथ

उसके हाथों में सजी थी
लाल लाल चूड़ियां,
सुर्ख लाल जोड़े में सजी
दुल्हन, पिता उत्सुक
कब वो घडी आये जो
बेटी के हाथ पीले कर
कन्यादान करूँ
सौप दू अपने कलेजे का टुकड़ा
एक अजनबी को
जो उसे उम्र भर मान दे, 
सम्मान दे
पूर्ण कर दे उसे 
बेटी से पत्नी में
पत्नी से माँ में,
है पीला रंग 
संपूर्णता का
अलग एहसास का
जीवन में दो अलग लोगो के 
साथ साथ चलने का

था साथ चलने का इरादा
आगे बढ़ने का वादा
कुछ कर गुजरने का दावा
लेकिन वक़्त को 
कुछ और ही मंजूर था
मिले, साथ चले 
बिछड़ भी गए
दे गया एक साथ 
दुसरे को
न जाने कितनी यादें, 
उदास खाली रातें, 
पहाड़ से दिन,
सूखी बरसाते,
बर्फ सी सर्दियां,
तेज़ चटकीली गर्मियां
जर्द् पीला चेहरा
जो अब कभी नहीं होगा 
लालो लाल
पीला रंग 
तू क्यों नहीं रखता
मौत सी घसीटती, 
पल पल मरती
जिंदगी का ख्याल

4 Comments:

At October 27, 2016 at 3:17 AM , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28-10-2016) के चर्चा मंच "ये माटी के दीप" {चर्चा अंक- 2509} पर भी होगी!
दीपावली से जुड़े पंच पर्वों की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

 
At October 28, 2016 at 2:14 AM , Blogger निवेदिता श्रीवास्तव said...

रूह को भी छू गयी आपकी कृति ....

 
At October 28, 2016 at 2:33 AM , Blogger Madan Mohan Saxena said...

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति

मंगलमय हो आपको दीपों का त्यौहार
जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार

 
At November 3, 2016 at 11:04 AM , Blogger Aparna Khare said...

Shukriya nivedita ji

 

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