Saturday, July 2, 2011

रोबोट सा चलता इंसान




रोबोट सा चलता इंसान
मूल्‍यो को खोता इंसान
कितना संवेदनहीन
होता  जा रहा है ये
भावनाओ को ही 
भूलता जा रहा है ये
भावनाओ का मूल्य 
अब कुछ नही रहा
बस जो दिमाग़ रूपी  
आइ सी कहा
वो ही किया
दिल की चिप को 
कर दिया है इनॅक्टिव
बस दिमाग़ से फ़ायदे  
की करते है प्रॅक्टीस
माँ, बाप, भाई, बहन
ना जाने कहाँ गये?
शायद दुनिया की भीड़ मे
कही गुम हो गये
जब ज़ज्बात की 
आइ सी  होगी फ्रेश
तभी सारे रिश्ते 
होंगे रेफ्रेश
वरना तो इस 
रोबोट मे
इंसान मिलना
मुश्किल है
इंसान अगर 
मिल भी जाए तो 
फीलिंग्स मिलना
नामुमकिन है
चलो फिर से सोए
इंसान को जगाए
भूले रिश्तो को
ताज़ा कर आए
तभी होगा
सच्चा पुरुषार्थ
जब इंसान सच मे 
देख पाए यथार्थ

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