Friday, November 18, 2011

मेरी आने वाली पुस्तक "कुछ यादें...कुछ बातें..कुछ साथ बिताए पल.....जो ना अब हमारे हैं" का कुछ अंश



तुम्हे याद हैं हमे मिले पूरे एक साल हो गये हैं २२ नवेंबर२०१० को हम पहली बार मिले थे जब हम मिले थे तो मैं तो राज़ी भी नही थी तुमसे दोस्ती के लिए लेकिन ना जाने कैसे तुमने मुझे राज़ी कर लिया अपनी जादू भारी बातों से और मैं तुम्हारे सम्मोहन मे खिचती चली गई ग़ज़ब का सेन्स ऑफ ह्यूमर हैं तुम्हारा कैसे मेरी सारी सीरियस बातों को भी तुम अपने हास्य का पुट दे दिया करते थे और मैं बस चिल्ला के रह जाती थी...धीरे धीरे  तुमने मेरे पूरे मन, दिल दिमाग़ सब पे अपना क़ब्ज़ा जमा लिया और मैं भी हर समय बस तुम्हारी बातों मे ही खोई रहने लगी..और समय अपनी रफ़्तार से दौड़ने लगा मुझे याद हैं कैसे तुमने मेरे जनम दिन को यादगार बना दिया था सच ऐसा जनम दिन तो मैसे आज तक नही मनाया इतनी दूर होकर भी तुम मेरे पास थे बिल्कुल धड़कनो की तरह धड़क रहे थे मेरे दिल मे...मुझे मेरी हर धड़कन साफ सुनाई दे रही थी... हम दिन भर बाते करते फिर भी हमारी बाते ख़तम ना होती...तुमने तो मुझे एक नई दुनिया मे पहुचा दिया था सच...मुझे लग रहा था मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नही रह पाउगी आज भी मेरा दिल तुम्हारे पास ही हैं तुम्हारी बाते, मेल्स मुझे सहज ही तुम्हारे करीब ले आते थे जबकि मैं डरती थी समाज से, दुनिया से और अपने आप से की कहीं हमारे प्यार को हमारी ही नज़र ना लग जाए और वोही हुआ ...अचानक ना जाने क्या हुआ तुम मुझसे दूर जाने लगे  अब तुम्हारे फोन कॉल्स बंद हो गये, ई मेल्स भी कहीं खोने लगे और ऑनलाइन आना तो तुमने बंद ही कर दिया और जब मैं कॉल करती तो कहते मैं बिज़ी हूँ या मीटिंग मे हूँ (डॅडी का फोन आ रहा हैं) कहकर बात नही करते थे मुझे आज तक समझ नही आया की मेरी ग़लती क्या हैं....मैने अपने आपको तुम्हारी यादों मे डूबा लिया और पहले तो शिकायत भी करती थी फिर वो भी बंद कर दिया....किस से करती शिकायत...और कौन सुनता मेरी शिकायत....जब तुम ही मेरे पास नही थे...

तुम्हारे पास भी लाखो उलझने थी काका प्रेशर था प्लस एक जबरदस्त धोखा भी था तुम्हारी लाइफ का जो तुम अकेले सफर कर रहे थे मैं समझ रही थी इसलिए अपने आप को मैने समय पे छोड़ दिया....की जब याद आएगी या कमी लगेगी तो लौट आओगे तुम मुझे अपने सच्चे प्यार पे पूरा भरोसा था और अब भी हैं अब जाने क्यूँ लग रहा हैं तुम मेरे पास लौट आओगे...क्यूंकी समय ने तुम्हारी बहुत सी उलझने सुलझा दी हैं और जो बाकी हैं उसे हम मिलकर सुलझा लेंगे...मेरा विश्वास पक्का हैं आ रहे हो ना तुम..
सच मे आज तुम्हारी बहुत याद आ रही हैं लेकिन समझ नही पा रही हूँ कि मैने ऐसा क्या कह दिया जो तुम यू ही मुझसे बताए बिने इतनी दूर निकल गये..सच बताउ तो मुझे ऐसे रिश्तो पे विश्वास ही नही था और ना मैं तुमसे कोई दिल का रिश्ता रखना ही चाहती थी...लेकिन तुमने मुझे इतनी दूर से भी, इतना प्यार दिया कि मैं होकर शिला होकर भी तुम्हारे आगे पिघलती चली गई...शायद ये मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी जो मैने की...  तुम खुद कभी मुझे याद करते नही और जब मैं तुम्हे याद करती हूँ तो तुम ना जाने कैसे इतने ठंडे तरीके से बात करते हो की लगता हैं बेकारही बात की...बस इतना बता दो...ऐसा मैने क्या कह दिया जो तुम मुझसे दूर चले गये कहाँ गया तुम्हारा मेरे प्रति वो प्यार, साथ जीने मरने की कसमे, उम्र भर हाथ ना छोड़ने का वादा....क्या वो सब एक दिखावा था...या कुछ और....मेरी समझ मे कुछ नही आ रहा..यू बिना बताए जिंदगी मे आना और चले जाना....ये सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम ही कर सकते हो...और कोई नही...जब लगे तुम्हे मेरी ज़रूरत हैं एक आवाज़ दे देना...मैं जहाँ भी होंगी...नंगे पैर भागती हुई चली आ जाउगी नही करूँगी तुमसे कोई सवाल नही माँगूंगी कोई जवाब....मन करे तो बता देना...नही तो कोई बात नही..



मुझे पता हैं तुम इतने केरिंग हो की मुझे भूल नही पाए होंगे....तुम्हारी आदत हैं अपने से जुड़े लोगो का ख़याल रखना मुझे सब अच्छे से याद हैं..कितना ख़याल  रहते थे तुम मेरा हर बात मे, कहाँ गई थी, क्या खाया, वहाँ पे कैसा रहा.. अब तुम पोज़ करते हो..की तुम्हे मेरा बिल्कुल ख़याल नही...ये मुझसे छिपा नही हैं...तुम्हारा करुणा वाला दिल जो ज़रा ज़रा सी बात पे मेरे लिए रो दिया करता था आज भी बिल्कुल वैसे  का वैसा हैं...तुम चाहे कितना दिखाओ....मैने तुम्हे तहे दिल से जान लिया हैं...तुम्हारे प्यार को पहचान लिया हैं तुम चाहे जो करो....मूज़े तुँसरे कोई गिला नही हैं....क्यूंकी मुझे तुमसे कुछ भी नही चाहिए....सच मे कुछ भी नही....
हा इतना ज़रूर हैं सोचा था मुझे अच्छा दोस्त मिल गया लेकिन तुम्हे शायद वो भी नही चाहिए, कोई बात नही...मुझे सब्र हैं
मेरा दोस्त जहाँ भी हैं ठीक हैं..भले वो मुझे भूल भी जाए कोई बात नही...कभी तो हमारी याद आएगी..कभी तो तुम्हे लगेगा तुमने कुछ खोया हैं...तब ही सही...वैसे मैने तुमसे तब भी कुछ नही चाहा था...लेकिन तुमने ही मज़बूर किया था उम्र भर साथ चलने के लिए...लेकिन मुझे उसका भी कोई मलाल नही क्यूंकी हो सकता हैं मैं तुम्हारे मापदंडो पे खरी ना उतरती हूँ....वो तुम्हारा अपना फ़ैसला हैं...हा इतना ज़रूर हैं तुमने मुझे अपनी आदत डाल दी हैं...वो भी कभी ना कभी हो सकता हैं...छूट ही जाए...बस मुझे तुम्हारी एक बात बहुत खलती हैं..की तुम रिप्लाइ नही करते क्या..तुम्हे इतना भी वक़्त नही मिलता या देना नही चाहते...क्यूंकी दुनिया मे भी एक रस्म हैं की अगर कोई कुछ भेजे तो उसको रिप्लाइ करते हैं या विश करते हैं...मंगल कामनाए देते हैं....माना मैं तुम्हारे लिए गैर हूँ..लेकिन एक साधारण सी मेल समझ कर ही जवाब दे दिया करो...तुम्हारे एक जवाब पे मैं नाची नाची घूमती हूँ...मुझे लगता हैं जैसे कोई ख़ज़ाना मिल गया...लेकिन शायद मैं इतनी खुशी की भी हक़दार नही..मैं ये सब तुम्हे नही बताना चाहती लेकिन...ना जाने क्यूँ तुम बहुत याद आते हो...तुम्हारी सारी बाते मुझे भूलती ही नही हैं....शायद ये भी मेरी ही ग़लती हैं जो मैं सच को अपना नही कर पा रही...तुम तो हर तरह से कोशिश कर रहे हो....
 


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