Sunday, April 15, 2012

मैं भी नही थी.

अभी कल ही तो समेटा था समान
आज फिर फैला दिया
अपनी वॉर्डरोब को
फिर से क्यूँ बिखरा दिया
मैने सहेज के रखी थी तुम्हारी चीज़े
अलग अलग किया था हर समान
कमीज़ पे कमीज़े,, मोज़ो पे मोज़े
पतलून पे पतलून, बनियाइन पे बनियाइन
सब बिखरा दिया
मेरी मेहनत पे पानी फिरा दिया,
ये तो चलो ठीक हैं लेकिन
लॉकर के भीतर रखे सुर्ख जोड़े मे लिपटे
खत क्यूँ निकाले .....और तो और
खतो के साथ मुझे भी निकाल लिया
जैसे ही तुमने उनपर उंगली फिराई
मैं बाहर आ गई, लगी तुमसे बतियाने
अपना दर्द तुमसे छिपा ना पाई
आँखो ने कुछ ऐसा किया कि
एक शब्द भी आँसू के कारण
समझ ना सकी....बस तुम्हारा चेहरा ही देखती रही
तुम भी क्या करते
तुमने भीजल्दी से समेट कर
सब पहले की तरह रख दिया
क्यूंकी अगर ज़्यादा देर हो जाती
तो आँसू का सैलाब निकल पड़ता
और तुम उसमे डूब जाते..........
तुम्हारा ढूँढना मुश्किल हो जाता..
मैं भी नही थी.. जो तुम्हे निकाल पाती


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