Wednesday, June 5, 2013

तुम्हारा दिल भी कान्हा की तरह बार बार जाकर वहीं पे रुकता हैं...

तुम्हारे प्यार मे उसे खुदा नज़र आता हैं..
तभी करती हैं वो तुम्हे इतना प्यार..
अमूर्त, अभिन्न, संसार की सोच से परे...
अनोखा पवित्र प्यार....
तभी नही रह पाती बिना तुम्हे सोचे..
जैसे राधा अधूरी हैं कान्हा के बिना..
वो भी शायद तुम्हारे बिना...............
उसकी सोच का दायरा तुमसे ही शुरू होकर
तुमपे ही जा सिमटता हैं..
यही कारण हैं..तुम्हारा दिल भी कान्हा की तरह
बार बार जाकर वहीं पे रुकता हैं...




1 Comments:

At June 5, 2013 at 2:54 AM , Blogger Madan Mohan Saxena said...

लाजवाब कविता. धन्यवाद ,

 

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