Saturday, November 2, 2013

स्त्री मन ही
समझ पाता  हैं
प्रेम
पुरुष मन तो
कठोर हुआ करते हैं
अहंकार के मारे,
दर्प से  भरे,
मग़रूर,
मन की  बात
समझ कर भी
न समझने वाले  

2 Comments:

At November 2, 2013 at 5:39 AM , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

 
At November 3, 2013 at 9:25 PM , Anonymous Anonymous said...


पुरुष मन ...कथित कठोर मन...
दर्प से भरे ....दम्भ से भरे ...
मगरूर होतें है ....स्त्रियों के लिए ..
शायद नहीं....
वे समझतें है स्त्रियों की उन प्रेम भरी बातों को
जो कभी ख़ामोशी की जुबान से कही जाती है ..
तो कभी उल्हाने के रूप में मुख से मुखरित हो आती है
प्रत्युत्तर में, बहुत कुछ कहने को होता है.... उनके हृदय में
मगर वे उसको मुखर नहीं होने देते ....
छिपा लेतें है बड़ी सफाई से अपने उस मन की ओट में...
जिन्हें स्त्री बड़ी आसानी से पढ़ लेती है ..
और जान लेती है चुपचाप ..
मनकी गहराइयों में छिपे ''पुरुष प्रेम'' को...

 

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