Wednesday, September 21, 2016

तुम्हारे होने का सबूत


कहाँ हो तुम
दो अपने 
होने का सबूत
कहीं तो 
नज़र आओ

लगाओ 
वही से सदा
जहाँ मौजूद हो
या दो 
फिर से आवाज़
एक बार तो 
मेरी खातिर
लौट आओ

दरो दीवार
खामोश है
मौसम भी है 
रुका रुका सा
टकटकी बांधे 
इंतज़ार में
खड़ी हूँ मैं

आओ तो जरा 
चैन लू
पलके झपकाउ

1 Comments:

At September 21, 2016 at 9:39 PM , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (23-09-2016) को "नेता श्रद्धांजलि तो ट्विटर पर ही दे जाते हैं" (चर्चा अंक-2474) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

 

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