Wednesday, August 24, 2016

जब भी लौटती हूँ 
मंदिर से
आँखों में आंसू 
भर आते है
एक ही सवाल 
आता है मन में
भगवन मैंने तुम्हारा 
क्या बिगाड़ा था
जो तुमने 
ऐसा दुःख दिया
जब पिता चाहिए था
पिता छीन लिया
जब भाई चाहिए था
भाई विहीन किया
कौन सी दुश्मनी 
निभा रहे हो
जब भी सोचती हूँ
थोडा दृढ बनू
कुछ अपनी ताक़त से 
खड़ी हो जाऊ
तुम टाँगे ही 
तोड़ देते हो
क्यों बार बार 
मुझे हिला देते हो
नहीं बची अब 
मुझमे हिम्मत
नहीं दे सकती 
तुम्हे अपने 
प्यार की कीमत
प्ल्ज़ अब 
रस्ते में मत आओ
मत सताओ
बहुत दुखी, 
बहुत अकेली हूँ
अब और नहीं 
झेल पाऊँगी
जो तुमने दिया दुःख
यही बहुत बड़े है
क्या करू 
अब तुम ही सुझाओ
अब मुझे दुःख से छुड़ाओ
या ले लो 
मेरी भी जान
ताकि 
न रहे बांस
न बजे बांसुरी
अपनों का बिछड़ना हिला देता है 

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