Monday, August 22, 2016

मूर्तिकार हो तुम


तुम सोच रहे होंगे
मैं तुम्हे भूल रही हूँ
मैं तुम्हे भूल नहीं रही
बल्कि तुमसे अलग 
सांस लेने की कोशिश
कर रही हूँ
जानती हूँ ये कोशिश
नामुमकिन है
तुम तो घुले हो
मेरी साँसों में
मेरी बातों में
मेरे चलने, उठने, बैठने में
मुझे क्या आता था
सब तुमसे ही तो 
सीखा था
तुम्ही तो थे 
मेरे ट्रेनर
मेरे मूर्तिकार
मुझे घढ़ने वाले
सच जो भी 
मुझे देखता है
मन ही मन कहता है
हीरा हूँ मैं
लेकिन 
उन्हें क्या पता
मुझे जनम मेरे माता पिता ने 
बेशक दिया है
लेकिन खूबियां 
तुमने भरी है
अपने अधिकारों के लिए लड़ना,
अपनी बात को अच्छे ढंग से कहना
अपने पैरों पे खड़े होना
ड्राइव करना
सब को सब बात न बताना
सरलता, सौम्यता, स्पष्टवादिता
सब तुमने ही तो सिखाया
यहाँ तक कि कैसे दिखना है 
सबके सामने, 
कब क्या बोलना है
क्या पहन ना है
क्या खाना है
ये सब भी तुमसे सीखा
अब बताओ 
जिसे तुमने बनाया हो
जिसने तुम्हे 
हर अपनी बात में 
समाया हो
वो तुम्हे कैसे 
भूल सकता है
इतने एहसान है तुम्हारे
क्या कोई 
नज़रअंदाज कर सकता है
नहीं न
तो अब कभी मत सोचना
मैं तुम्हे भूल गई
बस ये सोचना
मैं खुद को भूल सकती हूँ
तुम्हे नहीं

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