Thursday, January 19, 2012

जाड़ा बहुत भाता हैं


चाय की चुस्की और रज़ाई
और उसपे तुम कुछ कुछ अलसाई
मेरा भी बस चुपचाप तुम्हे देखे जाना
मन को रोमांचित कर जाता हैं
सच मे जाड़ा बहुत भाता हैं

घड़ी भागती तेज़ रफ़्तार से
तुमको भी हैं ऑफीस जाना
छोटा बच्चा रो रो कर जागता
मॅन बहुत घबराता हैं
सच मानो फिर भी
जाड़ा बहुत भाता हैं

सारे काम रुक से जाते हैं
जब सर्दी मे हाथ ठंडे हो जाते
ऐसे मे तुम्हारा नरम नाज़ुक हाथ
बहुत याद आता हैं.....
सच कहूँ जानम जाड़ा बहुत भाता हैं

7 Comments:

At January 20, 2012 at 3:44 AM , Blogger प्रवीणा said...

ये जाडा बहुत भाता है , इतनी ठंड मे ठंड का मीठा एहसास करा गयी आपकी रचना

 
At January 20, 2012 at 5:35 AM , Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर भावप्रणव अभिव्यक्ति!

 
At January 20, 2012 at 8:54 AM , Blogger aparna khare said...

thanks Praveena Ji....apko meri rachna pasand ayi...

 
At January 20, 2012 at 8:55 AM , Blogger aparna khare said...

thanks Uncle....

 
At January 20, 2012 at 4:38 PM , Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

 
At January 20, 2012 at 8:17 PM , Blogger अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

सकारात्मक दृष्टि, जग भला

 
At February 4, 2012 at 7:43 PM , Blogger Reena Maurya said...

वाह बहूत सुंदर लाजवाब रचना है
संस्कार कविता संग्रह में आपका स्वागत है ..

 

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