Thursday, August 28, 2014

सुनो कान्हा...तुम ही तुम



सच एक एहसास हो तुम
जीवन का विश्वास हो तुम..
तुमसे मिलता हर दम संबल..
बढ़ते रहते सबका मनोबल..
सच कहु मेरे जीवन की...
टूटी हुई एक आस हो तुम..
तुम बिन जैसे निःस्वास हुई मैं..
तडपू ऐसे मछली जल बिन..
मेरी हर एक स्वास हो अब तुम...
कैसे कहूँ क्या क्या हो तुम...
भाई बंधु सखा पिता...सब नाते ...तुमसे जा मिलते..
तुम ना हो तो सारे रिश्ते .......हवा मे घुलते दिखते..
तुमसे पल पल...तुम बिन.......... अधूरापन..
सुनो कान्हा...तुम ही तुम ...तुम ही तुम...

9 Comments:

At August 28, 2014 at 3:49 AM , Blogger Rajendra kumar said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (29.08.2014) को "सामाजिक परिवर्तन" (चर्चा अंक-1720)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

 
At August 28, 2014 at 4:23 PM , Blogger Parmeshwari Choudhary said...

Very beautiful picture.Very nice expression in eyes...and in your words ofcourse

 
At August 28, 2014 at 8:31 PM , Anonymous Anonymous said...

:).........nice

 
At August 28, 2014 at 11:36 PM , Blogger Rewa Tibrewal said...

sach aise hi hain kanha....sundar shabd

 
At August 28, 2014 at 11:51 PM , Blogger अपर्णा खरे said...

shukriya rajendra ji....charcha manch me rachna ko samman dene ke liye

 
At August 29, 2014 at 12:04 AM , Blogger अपर्णा खरे said...

Thanks Parmeshwari ji....for your lovely appreciation

 
At August 29, 2014 at 12:05 AM , Blogger अपर्णा खरे said...

dhanyawaad......

 
At August 29, 2014 at 12:06 AM , Blogger अपर्णा खरे said...

Thankss.....

 
At September 4, 2014 at 6:28 PM , Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

वाकई कान्हामय है पूरा जग।

 

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