Monday, September 8, 2014

समय की रेत से जाते नहीं निशान

कुछ शामे उदास क्यूँ होती हैं..
एक दिन उसने मुझसे पूछा..
सुनकर मैं हल्का सा मुस्कुराया
मैने कहा क्या हुआ हैं तुम्हे
क्यूँ  खोई  सी  रहती  हो
उसने हौले से सर हिलाया
बोली कुछ नही, बस यू ही
उसकी कुछ नही कहने मे भी
मानो  सब कुछ छिपा हुआ था
शायद वो सब कहना चाह रही थी
फिर भी खुद को छिपा रहा थी
यह  उसकी हमेशा की आदत थी
जब भी परेशान होती थी
उसे मेरी ही याद आती थी..
उसे पता था..उसके हर सवाल का जवाब
मैं ही दे सकता हूँ
बचपन से ही मैं उसका टीचर...गाइड
या यू कहे.... सही  राह दिखाने वाला मैं ही था
उसे स्कूल मे कोई परेशान करता हो..या विज्ञानं के आड़े तिरछे चित्र
हेर्बरियम उसका सब काम मैं ही किया  करता   था  
कई बार तो मुझे उसकी सुरक्षा मे
उसके स्कूल तक भी जाना पड़ता था..उसका सुरक्षा गार्ड बनकर
लेकिन मैं जानता था  वो मेरे सिवा
किसी  पर भी पूरा भरोसा नही कर पति हैं
सो मैं हमेशा उसकी हर छोटी बड़ी समस्या
झट से सुलझा दिया करता था
वो मुझे अपना ट्रबल शूटर कहा करती थी
पता नहीं कैसे देखते  देखते  दिन हवा हो गए
सब कुछ बदल गया.....
लेकिन अब भी वो उतनी ही बड़ी है
नहीं बदली वो
नहीं बदला मैं     बस समय  फिसल गया
लेकिन
निशान अब भी मौजूद हैं

3 Comments:

At September 13, 2014 at 4:33 AM , Blogger Vaanbhatt said...

very nice...

 
At October 3, 2014 at 11:57 PM , Blogger Vijaya Bhargav said...

हां रे...फिसल जाता है वक्त...रेत की मांनिन्द, रह जाते है तो बस निशान....बहुत सुन्दर रचना

 
At July 10, 2015 at 5:53 AM , Anonymous Anonymous said...

NICE...

 

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