Saturday, August 20, 2016

आँख मिचौली

दिल में दर्द है
आँखों में नमी है
सब हैं लेकिन
तुम्हारी कमी है
सांस चल रही है
वक़्त के साथ
धड़कने रुकने को है 
बेताब
रो रही जमी
रो रहा आसमान
देख रहे हो न तुम
ओ मेहरबान
बिन तुम्हारे
सब अधूरा
न तुम पूरे
न मैं पूरा
एहसास तो दिलाओ
कहाँ हो तुम
अब तो लौट आओ
बस बहुत हुई आँख मिचौली
कुछ तुमने खेली
कुछ मैंने खेली
अब करो 
इस खेल को ख़त्म
टूट जाये तुम्हारे
न होने का भरम
चलो तुम जीते
मैं हारी
अब आ जाओ
तुम पे सब बलिहारी

2 Comments:

At August 20, 2016 at 10:22 PM , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (22-08-2016) को "ले चुग्गा विश्वास से" (चर्चा अंक-2442) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

 
At August 21, 2016 at 11:01 PM , Anonymous Anonymous said...

nice.....:)

 

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