Thursday, August 18, 2016

मौत एक सच

मौत 
चिर निंद्रा
कुछ पता नहीं
कहाँ गया वो
जो कभी था
सशरीर अपना
उड़ गया पंछी
रह गई देह

तड़प रहा पंछी
पुरानी देह में आने को
नहीं दे रहा देवदूत
रोक कर खड़ा है 
रास्ता

कहाँ जाये जीव
बेबस बेचारा
न देह
न देह का रास्ता

अब तो भटकना होगा
जब तक न मिले मुक्ति
जब तक न मिले 
नया चोला

बस देखता रहे पंछी
अपनों का तड़पना
चिल्लाना
रोना
शोक मनाना

क्योंकि 
उसके पास
आवाज़ नहीं है
भाव है

लेकिन
देह नहीं है
बिना देह
सब स्वप्न
पंछी भी
पंछी के अपने भी

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