Wednesday, October 12, 2016

मेरी जिंदगी में 
इंद्रधनुष जैसे 
रंग सजाने वाले
मुझमे जो 
खोई थी मैं
मुझको मुझसे 
मिलाने वाले
था थोड़ा सा आकाश 
जो मुझसे, उसे छोड़
पूरे आकाश की 
सैर कराने वाले
जीना चाहती थी 
कुछ लम्हे तुम्हारे साथ
हर रंग, हर खुशबू, 
हर सपना, हर तन्हाई
प्यार भरा साथ
समझते थे
 तुम मुझे बिन कहे भी
फ़िर क्यों छुड़ा कर हाथ 
क्यों किया 
मुझे बेरंग, बेनूर
बताओ कहाँ से लाउ वो 
तितलियों से पंख
जो तुम तक पहुँचूँ
करू तुमसे मान मनुहार
सब दुःख तुमसे बांचु
छोड़ दिया अकेला डूबने
उतारने को
बोलो कहाँ जा के पहुँचूँ

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