Monday, August 1, 2016

जो अपना था वो सपना हुआ अब

खाक हो गया जिस्म
बच गई यादें
जो उम्र भर रहेगी
हम सबको सालती

खो गई वो 
मोहक मुस्कान
जिसका था 
जमाना गुलाम

तेरा हंसना, 
मुस्कुराना
हर एक को 
मोहब्बत से 
अपना बनाना
बन गया 
सपना सुहाना

अब कोई नहीं आएगा
न हँसाने, न गुदगुदाने, 
न अपना बनाने
न ही मार्ग दिखाने

उम् भर रहे जिनके 
पथ प्रदर्शक
आज वो 
दुनिया के लोग 
गायब है
लुटा दिया 
जिसके लिए 
अपना सब कुछ
हिंदी साहित्य के वो 
इंसान नदारत है

स्वार्थी इस दुनिया में
रहने का क्या फायदा
अच्छा किया 
चल दिए तुम वहां 
जहाँ 
न हो कोई झूठा कायदा

तुम रहो कहीं भी
यु ही सितारे से 
जगमगाते रहना
न दे दुनिया 
तुम्हे कुछ
फिर भी तुम 
कुछ गम न करना

तुम्हारा साफ दिल 
तुम्हारे साथ है
तुम्हारे कर्मो की स्लेट 
एकदम साफ है

सुनो अल्लाह के यहाँ 
इंसाफ बहुत पक्का है
होता है जरा देर से
लेकिन 
उस्ताद बड़ा सच्चा है

देना होगा हिसाब सबको
ये बात तो सच है
करने दो उन्हें दिल की
देखो क्या होता है
नहीं हुए जो तुम्हारे
उनका कौन होता है

(उमेश भैया को दिल से नमन)

2 Comments:

At August 2, 2016 at 1:45 AM , Anonymous Anonymous said...

naman.....:(

 
At August 2, 2016 at 3:56 AM , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (03-08-2016) को "हम और आप" (चर्चा अंक-2423) पर भी होगी।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

 

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