Tuesday, August 16, 2016

इंतज़ार सूनी आँखों का

देखो न तुम्हारे साथ 
जागने की 
आदत सी पड़ गई है
तुमको रात में जल्दी नींद 
नहीं आती थी
तुम इंटरनेट पे आँखे गड़ाये
मेरा इंतज़ार करते
और मैं 
तुमसे बेखबर मस्त 
थोड़ी सी तुमसे बात करके
सो जाया करती थी
तुम कहते भी थे 
"इतनी जल्दी सो गई"
मैं शैतानी से जवाब देती "हां"
मुझे सुबह बहुत काम है
तुम भी मन मसोस कर 
अपना काम बंद कर देते
और मेरी तरह झूठी मूठ
आँखे मूँद सो जाया करते

देखो आज तुम नहीं हो
तो मुझे भी नहीं आ रही
लग रहा है अभी आएगा 
तुम्हारा मेसेज
"सो गई क्या"
अब मुझे रात रात भर 
नींद नहीं आती
तुम्हारे मेसेज के लिए 
जागा करती हूँ
लेकिन तुम तो जैसे 
मुझसे सच्ची का ही 
रूठ ही गए हो
कभी सोचा है
कैसे रहूंगी मैं तुम्हारे बिना?
तुम्हे तो पता है
मुझे कितनी आदत है तुम्हारी?
मेरा एक भी काम 
तुम्हारे बिना नहीं होता
बताओ न 
क्यों चले गए इतनी दूर?
जहाँ से कोई नहीं आता
कैसे बर्दास्त करू ?
मैं तुम्हारी ये दूरी
या तो 
अपने पास बुला लो
या तुम 
आ जाओ प्लीज़
नहीं रह सकती मैं 
तुम्हारे बिना
ये तुम भी 
अच्छे से जानते हो
फिर क्यों गए मुझे 
तनहा छोड़ कर
प्ल्ज़ आ जाओ न
अब तुम्हे न तो 
परेशान करुँगी
न तनहा छोडूंगी
तुम्हारा हर पल 
ख्याल रखूंगी
मान लो न मेरी बात
जैसे पहले 
एक बार में 
मान जाया करते थे।

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